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भारतीय राजनीति में इन Tools ने निभाया है बड़ा किरदार

देश में चल रही राजनीति को समझना हर एक के बस की बात नहीं है। राजनीति को चमकाने के लिए समय समय पर शाम-दाम-दंड-भेद, हर तरह के तरीक़े अपनाने पड़ते हैं। कहा जाता है शस्त्र चलाने के लिए शास्त्र का पढ़ना ज़रूरी होता है। ठीक उसी तरह राजनीति में कब क्यों.. और कैसे माहौल बनाना है। ये बख़ूबी पता होना चाहिए।

भारतीय राजनीति में भी स्वतंत्रता से पहले और आज तक… राजनेताओं ने अपनी राजनीति को चमकाने के लिए ऐसे-ऐसे औजार और मशीनों का इस्तेमाल किया, जिसे जानकर आप हैरान हो जाएंगे। यदि आप भी जानना चाहते हैं। भारत में किन किन मशीनों या औज़ारों पर राजनीति हुई, जानने के लिए इस लेख को अंत तक पढ़ें।

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इन दिनों भारत की राजनीति में दो मशीनों के बड़े चर्चे हैं- पहला बुलडोजर और दूसरा लाउडस्पीकर। 1904 में बुलडोजर की खोज करते हुए बेंजामिन होल्ट… और 1876 में लाउडस्पीकर बनाते हुए हुए ग्राहम बेल; दोनों ने नहीं सोचा होगा कि उनका आविष्कार एक दिन भारत का सबसे बड़ा पॉलिटिकल औज़ार बन जाएगा।

कंस्ट्रक्शन साइट्स पर अक्सर दिखने वाला पीले रंग का बुलडोजर को आजकल क़ानून व्यवस्था का पालन कराते हुए देखा जा सकता है। और इस मिशन की शुरुआत की उत्तर प्रदेश के CM योगी आदित्यनाथ ने… 2017 से लेकर अब तक भू-माफियाओं- बदमाशों- अपराधियों के घर पर गरजने वाला बुलडोज़र… अब ‘बुलडोजर बाबा’ के नाम से देश भर में फेमस है।

बुलडोज़र का इस्तेमाल चुनाव में भी किया गया… 2022 में ही हुए UP चुनाव के दौरान BJP ने ‘UP की मजबूरी है, बुलडोजर जरूरी है’ का नारा भी दिया था। योगी बाबा के बुलडोजर मॉडल को अन्य राज्यों ने भी अपनाया। जिनमें मध्यप्रदेश और गुजरात भी शामिल हैं।

बुलडोज़र के बाद लाउडस्पीकर की आवाज पर खूब राजनीति खेली जा रही है। मंदिर, मस्जिद और शादी-पार्टियों में दिखने वाला स्पीकर की लाउड गूंज पिछले कुछ समय से महाराष्ट्र से लेकर UP तक की राजनीति में सुनाई दे रही है। दरअसल, महाराष्ट्र में नव निर्माण सेना पार्टी के अध्यक्ष राज ठाकरे ने मस्जिदों से 3 मई तक लाउडस्पीकर हटाने की मांग की थी।

ऐसा ना करने पर उन्होंने लाउडस्पीकर पर हनुमान चालीसा सुनाने की चेतावनी भी दी थी। महाराष्ट्र की आवाज़ UP पहुंचते ही… लाउडस्पीकर को हटाने के लिए के लिए अभियान चलाया गया।

बुलडोज़र, लाउडस्पीकर के बाद अब DNA की ओर चलते हैं। राजनीति में बड़े-बड़े धुरंधर अक्सर अपने प्रतिद्ंदी पर जात-पात या DNA का बुनियादी आरोप लगाते रहे हैं… 2015 में बिहार के CM और जदयू पार्टी के नेता नीतीश कुमार ने 1 लाख लोगों के DNA सैंपल PM ऑफिस भेजे थे।

दरअसल, बिहार चुनाव से पहले एक परिवर्तन रैली के दौरान PM मोदी ने कहा था कि सीएम नीतीश के DNA में कोई दिक्कत है, तभी वो बार-बार अपने राजनीतिक सहयोगियों का साथ छोड़ देते हैं…. इस बयान से बौखलाए नीतीश ने PM मोदी के खिलाफ ‘शब्द वापसी’ अभियान चलाया था।

भारत में कोई भी चुनाव चाहे वह प्रधानी.. विधायकी..हो या सांसदी का… माहौल बनाने के लिए रथयात्रा तो बहुत ज़रूरी है भाई साहब… आपको अब बता देते हैं… रथयात्रा कब शुरू हुई। राजनीति में पहली बार रथ यात्रा की शुरुआत पूर्व उप प्रधानमंत्री चौधरी देवी लाल ने की थी। साल था 1988 का… वीपी सिंह बोफोर्स घोटाले के खिलाफ पूरे देश में आवाज उठा रहे थे। इस दौरान उनका साथ दिया चौधरी देवी लाल ने… वे एक मेटाडोर में सवार होकर किसानों के बीच गए और अपनी बात रखी थी।

इस मेटाडोर को नाम दिया गया था क्रांति रथ और इस यात्रा को नाम दिया गया था क्रांति रथ यात्रा। नतीजन, क्रांति रथ यात्रा के बाद 1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को बड़ी हार का सामना करना पड़ा था… बताते चलें कि रथयात्रा को चलन में लाने का श्रेय जाता है लालकृष्ण आडवाणी को… वीपी सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद BJP ने एक और रथयात्रा निकाली… इसे नाम दिया गया था स्वर्ण जयंती रथ यात्रा, जिसका मकसद था राम मंदिर का निर्माण।

आप बचपन के दिनों में अपने घर में रेडियो तो ज़रूर देखें होंगे… रेडियो से भी बड़ी क्रांति रची गई है… 60-70 के दशक में मनोरंजन का मुख्य जरिया रहे रेडियो ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी अहम भूमिका निभाई… 1942 में म आंदोलनकारियों को पकड़ने का सिलसिला शुरू हो गया। इस दौरान अखबारों पर भी कई पाबंदियां लगा दी गईं।

9 अगस्त, 1942 को महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ नारा देने के बाद कुछ युवा कांग्रेस समर्थकों ने एक बैठक की जिसमें अखबार की जगह रेडियो का इस्तेमाल करने का फैसला हुआ था।

इंग्लैंड से टेक्नोलॉजी सीखकर आए नरीमन अबराबाद प्रिंटर ने ट्रांसमिटर बनाया और कांग्रेस कार्यकर्ता ऊषा मेहता ने प्रसारण की कमान संभाली… रेडियो स्टेशन का नाम ‘द वॉयस ऑफ फ्रीडम’ रखा गया था।

बुलडोज़र, लाउडस्पीकर, डीएनए, रथयात्रा, रेडियो, के अलावा कई और टूल भी भारतीय राजनीति को दिशा देते रहे हैं। महात्मा गांधी जी का चरखा.. गांधी जी की दांडी यात्रा.. नमक आंदोलन.. 1857 में कमल का फूल-रोटी.. जैसे तमाम टूल भारतीय राजनीति में अहम हथियार साबित हुए थे। अब देखना होगा कि भविष्य की राजनीति में कौन-कौन से नए टूल शामिल किए जाएंगे।

By : News Desk

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