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क्यों चर्चा में है राजद्रोह कानून, क्यों होने जा रहा है ये बदलाव ?

इस समय तमाम मुद्दों के बीच राजद्रोह क़ानून चर्चा का विषय बना हुआ है। आए दिन अलग अलग राज्य सरकारें राजद्रोह क़ानून का बख़ूबी इस्तेमाल कर रही है। उत्तर प्रदेश हो, मध्यप्रदेश हो, या फिर गुजरात या महाराष्ट्र या फिर देश के सभी राज्य, अपने हिसाब से इस क़ानून का उपयोग करते आए हैं। उदाहरण के तौर पर देखा जाए नवनीत राणा, उमर ख़ालिद, शरजील इमाम, हार्दिक पटेल। ये सभी राजद्रोह क़ानून का सामना कर रहे हैं।

Supreme Court

बताते चलें कि राजद्रोह क़ानून इस समय क्यों ट्रेंडिंग टॉपिक बना हुआ है। दरअसल, हाल ही के दिनों में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि वह राजद्रोह कानून की समीक्षा के लिए तैयार है। अब सर्वोच्च न्यायालय ने भी केंद्र के इस रुख के बाद कहा है कि जब तक सरकार राजद्रोह कानून के भविष्य पर फैसला नहीं करती, तब तक इसे रद्द किया जाएगा और इसके आरोपी भी जमानत याचिका दायर कर सकते हैं।

राजद्रोह क़ानून देश और देश की जनता के लिए कितना उचित है। या अनुचित, राजद्रोह कानून के औचित्य पर सवाल उठ क्यों रहे हैं… इन्हीं पर आज विश्लेषण करेंगे, आंकड़े बताते हैं पिछले 12 साल में राजद्रोह के मामले में जबरदस्त उछाल दर्ज किया गया है। खासकर मोदी सरकार के राज में यह मामले तेजी से बढ़े। इसके साथ ही जब से NCRB ने इससे जुड़ा डेटा प्रकाशित करना शुरू किया, तब से इन आंकड़ों के बीच में और ज़्यादा फ़र्क़ देखनें को मिला।

सवाल है कि पिछले 12 साल में कितनी बार हुआ राजद्रोह क़ानून का इस्तेमाल, तो जवाब मिलता है, राजद्रोह कानून पर 2010 से 2021 तक का डेटा रखने वाली वेबसाइट आर्टिकल 14 के मुताबिक, इस पूरे दौर में देश में राजद्रोह के 867 केस दर्ज हुए। वेबसाइट ने जिला कोर्ट, हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, पुलिस स्टेशन, NCRB रिपोर्ट और अन्य माध्यमों के जरिए बताया है कि इन केसों में 13 हजार 306 लोगों को आरोपी बनाया गया। हालांकि, जितने भी लोगों पर केस दर्ज हुआ था, डेटाबेस में उनमें सिर्फ तीन हजार लोगों की ही पहचान हो पाई।

दूसरा सवाल आता है कि 11 साल में ये हाल, तो मोदी सरकार में क्या हुआ…. NCRB की रिपोर्ट के मुताबिक, 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से 2021 तक 595 राजद्रोह के मामले दर्ज हुए। यानी 2010 से दर्ज हुए कुल मामलों में से 69 फीसदी NDA सरकार में ही दर्ज हुए… अगर इन मामलों का कुल औसत निकाला जाए तो जहां 2010 के बाद से UPA सरकार में हर साल औसतन 68 केस दर्ज हुए, तो वहीं NDA सरकार में हर साल औसतन 74.4 मामले दर्ज हुए।

तीसरा सवाल सामने आता है कि NCRB से कितना अलग है ये डेटा… तो आपको बता दें कि पहली बार नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो यानि NCRB ने राजद्रोह से जुड़े केसों का डेटा 2014 से ही जुटाना शुरू किया था। हालांकि, एनसीआरबी के आंकड़ों की मानें तो 2014 से 2020 के बीच राजद्रोह के 399 मामले ही दर्ज हुए हैं… आर्टिकल 14 ने इस दौरान ही राजद्रोह के 557 मामले दिखाए हैं।

चौथा सवाल है कि आखिर क्यों आया ये फर्क? तो आप को बता दें कि आर्टिकल 14 ने अपने रिकॉर्ड्स में यह साफ किया है कि NCRB का डेटा राजद्रोह के सभी मामलों को पूरी तरह कवर नहीं करता। इसकी वजह यह है कि ऐसे मामले, जिनमें कई और धाराओं का इस्तेमाल किया जाता है। NCRB ऐसे मामलों में सिर्फ उन धाराओं को गिनता है, जिनका परिमाण ज्यादा होता है।

पाँचवा सवाल है कि इन केसों में कोर्ट के फैसलों का क्या हुआ, कितनों को दोषी पाया गया… राजद्रोह के इन 867 केसों में महज 13 लोगों को ही दोषी पाया गया… यानी इनमें जो 13,000 आरोपी बनाए गए, उनमें से सिर्फ 0.1 फीसदी ही राजद्रोह का दोषी पाया गया। हालांकि, इन मामलों में फंसे लोगों को किस तरह की परेशानी से गुजरना पड़ा, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक आरोपी को जमानत मिलने तक औसतन 50 दिन जेल में बिताने पड़े। वहीं, अगर जमानत के लिए किसी को हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा तो उसे राहत मिलने में औसतन 200 दिन लगे।

छठवाँ सवाल जन्म ले रहा है कि किन राज्यों में राजद्रोह के सबसे ज्यादा केस?.. तो आँकड़े दर्शाते हैं कि 2010 से लेकर 2021 तक के डेटा को देखा जाए तो सामने आता है कि राजद्रोह का सबसे ज्यादा इस्तेमाल जिन पांच राज्यों में किया गया, उनमें दो में भाजपा के मुख्यमंत्री तो दो में एनडीए की सहयोगी पार्टियों के सीएम रहे। वहीं एक में विपक्षी पार्टी के सीएम थे… जहां बिहार में 2010 के बाद कुल 171 ऐसे केस दर्ज हुए, तो वहीं दूसरे नंबर पर तमिलनाडु रहा… इसके बाद उत्तर प्रदेश, झारखंड और कर्नाटक रहे।

आरोपियों के लिहाज से बात करें तो राजद्रोह के मामलों के सबसे ज्यादा 4641 आरोपी झारखंड में बनाए गए… वहीं, तमिलनाडु में 3601, बिहार में 1608, उत्तर प्रदेश में 1383 और हरियाणा में 509 राजद्रोह के आरोपी बनाए गए।

सातवाँ सवाल है कि किन-किन पर लग चुका है राजद्रोह? जानकारी के लिए बता दें कि जिन लोगों पर राजद्रोह के सबसे ज्यादा केस लगाए गए, उनमें सामाजिक कार्यकर्ता और समूह सबसे ज्यादा निशाने पर रहे हैं… इन पर 99 केस दर्ज हुए और कुल 492 आरोपी बनाए गए। वहीं अकादमिक और छात्र वर्ग के खिलाफ राजद्रोह की धारा में 69 केस दर्ज हुए और 144 आरोपी बनाए गए… राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर 66 केस दर्ज हुए और 117 आरोपी बनाए गए… दूसरी तरफ आम कर्मचारियों और व्यापारियों के खिलाफ 30 मामले दर्ज हुए, जबकि 55 आरोपी बनाए गए… पत्रकारों के खिलाफ 21 केस बनाए गए और 40 आरोपियों पर कार्रवाई की गई।

बहरहाल, राजद्रोह क़ानून पर चर्चा तेज़ है… अब देखना होगा कि राजद्रोह का सामना कर रहे नवनीत राणा-उमर खालिद-शरजील इमाम-हार्दिक पटेल जैसे अनेक लोगों का अब क्या होगा, क्या जो जेल में बंद हैं… वो खुली हवा में साँस ले पाएँगे या सलाखों के पीछे रह जाएँगे… सुप्रीम कोर्ट की सुप्रीम सुनवाई और केंद्र सरकार की ओर से पुर्नविचार भविष्य की दशा और दिशा तय करेगा।

By : News Desk

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