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FACT CHECK: तो भई बात ऐसी है….मर्द को भी दर्द होता हैं!

समाज एक सिक्के की तरह है…जिसके दो पहलू हैं। अच्छाई और बुराई और इन दो पहलू में हर कोई बराबर फिट नहीं बैठता…फिर वो लड़का हो या लड़की। समाज अपने हिसाब से लोगों को माप कर अपनी विचारधारा बना लेता है। लेकिन हमारे समाज में ही इंसान के रूप में दरिंदे भी रहते है….जिन्हे शायद आप पहचान भी ना पाएं…और जब वो अपना किसी को शिकार बनाते है, तब जा कर दो मुखोटे वाले लोगों का पर्दाफाश होता है।

FACT CHECK

योनशोषण जिसका आंकड़े भारत में बेहद ही खराब है बता दें कि, बीते दिनों खबर आई कि राजस्थान में बाल आयोग ने छेड़छाड़-दुष्कर्म की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए जागरूकता अभियान शुरू किया है। चूंकि ऐसी घटनाओं में बच्चियों को बड़े पैमाने पर निशाना बनाया जा रहा है तो बाल आयोग की यह पहल उचित कही जाएगी….. वैस ये जरूरी भी है कि उन्हें शुरूआत से ही ‘गुड टच-बैड टच’ के बारे में बताया जाए।

हालांकि इस जागरूकता अभियान में लड़कों को शामिल नहीं किया गया…. इससे प्रतीत होता है कि आयोग की नजरों में लड़कों के लिए ऐसे प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं है और लड़कियों की तरह उनका यौन उत्पीड़न नहीं होता। लेकिन ये सच नहीं है, यह धारणा पूरी तरह गलत है कि अमूमन लड़कों का यौन उत्पीड़न नहीं होता…. आखिर ऐसे झूठ समाज में क्यों फैले हुए हैं? क्या अगर वो लड़का है तो…उसके साथ दुष्कर्म नहीं हो सकता…बता दें कि एनसीआरबी का साल 2020 के आंकड़ों को बाहर से देखने पर जो तस्वीर दिखाई दे रही है, वो तो यही कहती है कि पिछले साल चाइल्ड सेक्सुअल अब्यूज का शिकार होने वालों में 99 फीसदी लड़कियां हैं….और 2020 में पॉक्सो यानि कि (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन अगेन्स्ट सेक्सुअल ऑफेंस) के तहत बाल यौन शोषण के कुल 28,327 केस दर्ज हुए, जिनमें से 28,058 केस ऐसे थे, जिनमें यौन हिंसा का शिकार होने वाली लड़की थी लड़के सिर्फ 269 थे।

लेकिन जो ये आंकड़ा कह रहा है, क्या वह हकीकत है, आंकड़ों की मानें तो सिर्फ वयस्क मर्द ही नहीं, एक छोटा बच्चा भी, अगर उसका जेंडर मेल है तो वह इस समाज में एक लड़की के मुकाबले ज्यादा सुरक्षित है। लेकिन क्या सचमुच ऐसा है? क्या सचमुच बचपन में होने वाले यौन शोषण की घटनाओं में जेंडर गैप इतना ज्यादा है। या उन मामलों में पुलिस और न्यायालय तक पहुंचने के रास्ते में कोई गैप है। सच आखिर है क्या ?
क्या सच में वो मर्द है और मर्द को दर्द नहीं होता। वाली फिल्मी लाइन समाज में एक किल तरह ठुक गई है। बता दें कि अमेरिका के एक नॉन प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन RAINN (रेप, अब्यूज एंड इंसेस्ट नेशनल नेटवर्क) का एक सर्वे कहता है…. कि एक मेल और फीमेल चाइल्ड में जेंडर भेदभाव उस तरह से नहीं होता, जैसाकि एक वयस्क मर्द और औरत के बीच होता है। छोटे बच्चे, चाहे वह लड़का हो या लड़की, दोनों ही एक बराबर वलनरेबल होते हैं। लड़कों के साथ भी चाइल्ड सेक्सुअल अब्यूज की घटनाएं बहुत बड़े पैमाने पर होती हैं।
ये है कि लड़के इस बारे में कभी बात नहीं करते….. उनके भीतर की शर्म और गिल्ट लड़कियों से कहीं ज्यादा होता है क्योंकि एक मर्द के रूप में उन पर ताकतवर दिखने का बोझ लड़कियों से कहीं ज्यादा होता है।

इस मामले में अपनी राय देते हुए मर्सर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर पैट्रीजिया रिकार्दी बताते हैं कि, “जिस तरह समाज स्त्रियों से एक खास तरह के व्यवहार की अपेक्षा करता है, वैसे ही मर्दों से भी हमेशा ताकतवर होने, शासन करने और नियंत्रक की भूमिका में होने की उम्मीद की जाती है। जिस पर बचपन से ही ये जिम्मेदारी थोप दी गई हो कि वह रक्षक है, उसका काम अपने से कमजोर लड़कियों की रक्षा करना है, उसके लिए यह स्वीकार करना कितना मुश्किल होगा कि वह भी कमजोर और वलनरेबल है. उसे भी मदद की जरूरत है, उसे भी जरूरत है कि कोई उसको प्रोटेक्ट करे।

बता दें कि मर्दों के वॉयलेंट होने की एक वजह ये भी है कि एक बच्चे के रूप में परिवार और समाज उनके साथ एक खास तरह का वॉयलेंस कर रहा होता है। लड़कों को रोने या कमजोर होने के लिए शर्मिंदा किया जाता है। एक ओर उनकी भावनाओं की कद्र नहीं होती, वहीं दूसरी ओर परिवार और समाज उन्हें बेलगाम अधिकार दे देता है… जाहिर है, संतुलन तो बिगड़ ही जाएगा।

अब अगर हम सजा कि बात करें तो…..वर्तमान में किसी लड़के के साथ बलात्कार की न्यूनतम सजा 10 साल कैद है। लेकिन 16 साल से कम उम्र की लड़कियों के साथ यौन अपराध की न्यूनतम सजा 20 साल कैद है।

तो ऐसा है कि मर्द को भी दर्द होता है…और वो लड़का है…लेकिन सब कुछ हंस कर नहीं सह सकता है।

By : News Desk

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